• +91 9923190440
  • info@jakind.com






पित्त रोग – आयुर्वेद ।

शरीर को गर्मी देने वाला तत्व ही पित्त कहलाता है। पित्त शरीर का पोषण करता हैं यह शरीर को बल देने वाला है। लारग्रंथि, अमाशय, अग्नाशय, लीवर व छोटी आँत से निकलने वाला रस भोजन को पचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पित्त का शरीर में कितना महत्व है, इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि जब तक यह शरीर गर्म है तब तक यह जीवन है। जब शरीर की गर्मी समाप्त हो जाती है अर्थात् शरीर ठण्डा हो जाता है तो उसे मृत घोषित कर दिया जाता है।

पित्त रोग लक्षण एवं परेशानी

शरीर में पित्त का निर्माण अग्नि तथा जल तत्व से हुआ है। जल इस अग्नि के साथ मिलकर इसकी तीव्रता को शरीर की जरूरत के अनुसार सन्तुलित करता है। पित्त अग्नि का दूसरा नाम है। अग्नि के दो गुण विशेष होते हैः- 1. वस्तु को जला कर नष्ट कर देना 2. ऊर्जा देना।इस्वर ने हमारे शरीर में इसे जल में धारण करवाया है जिस का अर्थ है कि पित्त की अतिरिक्त गर्मी को जल नियन्त्रित करके उसे शरीर ऊर्जा के रूप में प्रयोग में लाता है। यह स्वाद में खट्टा, कड़वा व कसैला होता है। इसका रंग नीला, हरा व पीला हो सकता है। यह शरीर में तरल पदार्थ के रूप में पाया जाता है। यह वज़न में वात की अपेक्षा भारी तथा कफ की तुलना में हल्का होता है। पित्त यूं तो सम्पूर्ण शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में रहता है लेकिन इसका मुख्य स्थान हृदय से नाभि तक है। समय की दृष्टि से वर्ष के दौरान यह मई से सितम्बर तक तथा दिन में दोपहर के समय तथा भोजन पचने के दौरान पित्त अधिक मात्रा में बनता है। युवावस्था में शरीर में पित्त का निर्माण अधिक होता है।

प्रकृतिः-

पित्त प्रधान व्यक्ति के मुँह का स्वाद कड़वा, जीभ व आंखों का रंग लाल,शरीर गर्म, पेशाब का रंग पीला होता है। ऐसे व्यक्ति को क्रोध अधिक आता है। उसे पसीना भी अधिक आएगा। कई बार ऐसा देखा गया है कि पित्त प्रधान व्यक्ति के बाल कम आयु में ही सफेद होने लगते हैं।

कार्यः-

पित्त हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करता हैः-भोजन को पचाना।  नेत्र ज्योति।  त्वचा को कान्तियुक्त बनाना।  स्मृति तथा बुद्धि प्रदान करना। भूख प्यास की अनुभूति करना। मल को बाहर कर शरीर को निर्मल करना।

लक्षणः-

युवावस्था में बाल सफेद होना।  
नेत्र लाल या पीेले होना।  
पेशाब का रंग लाल या पीला होना। 
दस्त लगना।  
नाखून पीले होना।  
देह पीली होना।  
नाक से रक्त बहना।  
गर्म पेशाब आना।   
पेशाब में जलन होना।  
अधिक भूख लगना।  
ठण्डी चीजें अच्छी लगना। 
अधिक पसीना आना। 
शरीर में फोड़े होना।  
बेचैनी होना आदि। 

पित्त के कुपित होने के कारणः-

कड़वा, खट्टा, गर्म व जलन पैदा करने वाले भोजन का सेवन करना।  तीक्ष्ण द्रव्यों का सेवन करना।  तला हुआ व अधिक मिर्च, मसालेदार भोजन करना।  अधिक परिश्रम करना।  नशीले पदार्थों का सेवन करना।  ज्यादा देर तक तेज धूप में रहना।  अधिक नमक का सेवन करना।

सन्तुलित पित्त जहाँ शरीर को बल व बुद्धि देता है, वहीं यदि इसका सन्तुलन बिगड़ जाए तो यह बहुत घातक सिद्ध होता है। कुपित पित्त से हमारे शरीर में कई प्रकार के रोग आते हैं।